हम किसी जाति के जन्म लेंगे यह हमारे वंश में नही है। यह मात्र संयोग है इसलिए जाति के आधार पर भेद करना पाप है-हिरेमठ
टिमरनी:-
हम किसी जाति के जन्म लेंगे यह हमारे वंश में नही है। यह मात्र संयोग है इसलिए जाति के आधार पर भेद करना पाप है। दुनिया के सभी प्राणी सुख प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करते है लेकिन समाज के सुख में ही अपना सुख निहित है इसलिए समाज के सुख के लिए प्रयत्न करना चाहिए। यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और केन्द्रीय कार्यकारिणी के सदस्य श्री सुहासराव हिरेमठ ने टिमरनी में आयोजित श्रद्धेय भाऊ साहब भुस्कुटे स्मृति व्याख्यानमाला के 28वें वार्षिक आयोजन में सामाजिक समरसताः-समय की पुकार विषय पर अपना व्याख्यान दे रहे थें। उन्होंने कहा कि संगठित समाज ही सुखी समाज होता है और समरस समाज ही संगठित रह सकता है। अच्छे और बुरे लोग सभी समाजों में होते है। व्यक्ति के विकारों का समाज के अच्छे या बुरे होने से कोई संबंध नही है। विकार और विकृति दूर करने के लिए संस्कारों की आवष्यकता होती है। हमारे सभी धर्म ग्रंथो में भेद की कहीं भी चर्चा नहीं है। श्री हिरेमठ ने अपने उद्बोधन में बाबा साहब डाॅ. भीमराव अम्बेडकर के जीवन की चर्चा करते हुए कहा कि अपमान और तिरस्कार पूर्ण वातावरण में रहकर भी उन्होने उच्च षिक्षा प्राप्त की। उन्होंने अपने अछूत समाज की उन्नति के लिए बहुत प्रयत्न किया और इसके लिए उन्हे बहुत संघर्ष करना पड़ा। इस सबके बाद भी उन्होंने मुसलमान या ईसाई बनने के प्रलोभनों को ठुकरा दिया। उन्होंने भारत में जन्में बौद्ध मत को स्वीकार किया। हिन्दू समाज पर डाॅ. अम्बेडकर का यह बहुत बड़ा उपकार है।
श्री हिरेमठ ने आगे कहा कि जम्मू कष्मीर में धारा 370के प्रावधान के लिए शेख अब्दुल्ला ने डाॅ. अम्बेडकर से बात की वे उस समय कानून मंत्री थे। बाबा साहब ने शेख अब्दुल्ला से इस प्रावधान के लिए स्पष्ट इंकार कर दिया। उन्होंने कभी भी हिन्दू समाज या राष्ट्र के हितो से समझौता नही किया। उन्होंने कहा कि गुरू गोविन्दसिंह ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए खालसा पंथ की स्थापना की थी। उनके पंज प्यारे देष के विभिन्न भागों से और नीची कहीं जाने वाली जातियों से थे। स्वामी विवेकानन्द जी ने भी छुआछूत को पागलपन कहा था। शहीद भगत सिंह ने भी देषभक्ति के साथ-साथ सामाजिक समरसता के लिए कार्य किया था।समय-समय पर देष के विभिन्न भागों में छुआछूत की होने वाली दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं की चर्चा करते हुुए श्री हिरेमठ ने कहा कि आज भी हमें समाज में छुआछूत की भावना देखने को मिलती है। इन घटनाओं के कारण यदि इस समाज के लोगों मे क्रोध दिखाई देता है तो यह स्वाभाविक ही है। इस कारण संघ के वर्तमान सरसंघ चालक डाॅ. मोहन राव भागवत ने कहा कि सब के लिए मंदिर प्रवेष, सबके लिए एक पनघट और एक ही श्मषान होना चाहिए। जाति के आधार पर किसी को श्रेष्ठ या हीन मानना पाप है। हमें सामाजिक समरसता के लिए काम करना चाहिए। यह भाषण का विषय नही है अपितु आचारण का विषय है।समरसता के लिए हमें यदि कुछ नुकसान भी होता है तो वह हंसकर सहन करना चाहिए। हिरेमठ जी ने समरसता के अनेक सुखद संस्मरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि समरसता के लिए हृदय से विचार करने की अवष्यकता है। कल की तरह आज भी कड़कडाती ठंड के बावजूद भारी संख्या में श्रोता उपस्थित थें।
कार्यक्रम की अध्यक्षता सेवा निवृत्त रेंजर और समाजसेवी श्री मन्नूलाल पुराणकर ने की तथा संचालन डाॅ. राहुल अग्रवाल ने किया। प्रारम्भ में भाऊ साहब जी के चित्र के समक्ष अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित किया। अतिथियों का स्वागत राम भुस्कुटे एवं छोटेलाल पंवार ने किया। स्निग्धा भुस्कुटे और शौनक भुस्कुटे ने मराठी प्रार्थना प्रस्तुत की। उदित जैन, रजनीष मण्डलोई, प्रियांषु सोलंकी और प्रीतम तंवर एवं साथियों ने गीत प्रस्तुत किया। रोहित काषिव ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। वन्देमातरम् के गान से कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।