भारतीय लोगों के रक्त में ही सेवा का भाव है भारत में सेवा सिखानी नहीें पड़ती, वह तो जन्मजात ही सबके ह्दय में सेवा का भाव होता है - सुहासराव
टिमरनी:- नि.प्र.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य सुहासराव हिरेमठ ने कहा कि भारतीय लोगों के रक्त में ही सेवा का भाव है । भारत में सेवा सिखानी नहीें पड़ती, वह तो जन्मजात ही सबके ह्दय में सेवा का भाव होता है । वे टिमरनी में आयोजित श्रध्देय भाऊ साहब स्मृति व्याख्यानमाला केे तीसरे और अंतिम दिन ’’सेवा सर्वांगीण उन्नति का मार्ग ’’ विषय पर अपना व्याख्यान दे रहे थे ।
उन्होंने कहा कि आज भी बुरा काम करने वालों से सेवा करने वालों की संख्या बहुत ज्यादा है। लेकिन दुर्भाग्य से अच्छे कार्य करने वालों की तरफ भारतीय मीडिया का ध्यान नहीं जाता । भारत में कत्व्र्य समझकर निर्पेक्ष भाव से सेवा करने की परंपरा है । सेवा से स्वयं का कल्याण होता है, जिसकी सेवा की जाती है उसे लाभ होता हैै और देखने वालों का जीवन भी धन्य है । श्री हिरेमठ जी ने कहा कि हमारे देष में सेवा को पुजा की तरह माना जाता है । लेकिन दुर्भाग्य से अंग्रेजी शासन आने के बाद सेवा का अर्थ बदल गया । सेवा को या नौकरी को सर्विस कहा जाने लगा ।लेकिन पैसे लेकर काम करना सेवा नहीं है । वयापार में राजनीति में सेवा का अर्थ ही दूसरा हो गया है । और इसाई मिषनरियों द्वारा सेवा के माध्यम से मतांतरण किया जाता है । यह सेवा नहीं है ।अलग अलग उद्देष्य लकर सेवा कार्य करने से सेवा का अर्थ बदल गया । निर्पेक्ष भाव से की गयी सेवा का प्रभाव समाज पर पड़ता है । आज भी भारत में 30 प्रतिषत लोग गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करते है । वे अपनी मूलभूत आवष्यकताओं की पूर्ति करने में भी असतर्थ है ।उन्होंने कहा कि सेवा करने के लिए समय पैसा और स्वस्थ्य की आवष्यकता होती है । लेकिन इन सबसे अधिक सेवा के लिए संवेदना की आवष्यकता होती है । अपने दुःख को वेदना कहते है लेकिन दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझने को संवेदना कहते है । जब हमारे मन में संवेदना उत्पन्न होती है तभी सेवा का भाव जागृत होता है । जब तक दूसरे की पीड़ा नहीं देखते तब तक संवेदना जागृत नहीं होती और जब तक संवेदना जाग्रत नहीं होती तब तक सेवा भाव पैदा नहीं होता । सेवा के बारे में भारतीय चिन्तन सर्वश्रेष्ठ है ।प्यासे को पानी पिलाना भूखे को भोजन कराना यह सेवा हमारे देष में तीसरे दर्जे की सेवा कहलाती है । दूसरे दर्जे की सेवा वह है जिसमें सेवा के माध्यम से किसी को अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बनाया जाता है । प्रथम श्रेणी की सेवा वह है कि सेवा करते हुए सेवा प्रप्त करने वाले को भी सेवा करने वाला बना दिया जाए ।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक पूरे देषभर में डेढ़ लाख सेवा कार्य चलाये जा रहे है । सेवित को सेवक बनाने का कार्य इनके माध्यम से किया जाता है । देष हमें देता है सबकुछ हम भी तो कुछ देना सीखें का भाव जगाने का काम किया जाता है । हमें समाज में दो वर्ग निर्माण नहीं करना है जिसमें एक वर्ग जीवन भर सेवा लेता रहे और दूसरा वर्ग जीवन भर सेवा देता रहे ।कर्मचारी कार्यकर्ता बने , दानदाता समयदाता बने और सेवित सेवक बने इस प्रकार की प्रथम श्रेणी की सेवा करना होगा ।सेवा के माध्यम से केवल आवष्यकताओं की पूर्ति करने से काम नही चलेगा उनमें चरित्र निर्माण के लिए संस्कार भी देना होगा तभी सेवा कार्यो की सार्थकता होगी। सेवा के माध्यम से देषभक्ति और व्यसन मुक्ति के काय्र भी आवष्यक है। आज भी देष के बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो सेवा कार्यो से वंचित है उनके लिए सेवा कार्य प्रारम्भ करने की आवष्यकता हैं हमें अपने आस पास चलने वाले सेवाकार्यो को देखने अवष्य जाना चाहिए। सेवा कार्य के लिए नियमित रूप से कुछ न कुछ अवष्य देना चाहिए। स्वयं भी किसी न किसी सेवा कार्य से जुड़ना चाहिए। सुख बाहर नहीं सुख अंदर है। जो स्वयं की चिन्ता करता है। वह सर्वाधिक दुखी होगा है। और ना दूसरों की चिन्ता करता है वह सबसे सुखी होता है।कार्यक्रम की अध्यक्षता सुपरिचित मानस मर्मज्ञ और कथा वाचक श्री श्याम स्वरूप जा मनावत ने की तथा कार्यक्रम के प्रारंभ में श्रध्देय भाऊ साहब जी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्जवलन किया गया। बच्चों ने नर्मदाष्टक का सुमधुर गान किया । रमेश दीक्षित ने स्वामी विवेकानन्द के एक प्रसिध्द अवतरण का वाचन किया ।अंत में डाॅ. अतुल गोविंद भुस्कुटे ने सभी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की । वन्दे मातरम् के गान से वयाख्यानमाला का यह सत्र सम्पन्न हुआ ।