टिमरनी:-
विश्व हिन्दू परिषद के अन्तर्राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री हुकुमचन्द साँवला ने कहा कि महाराणा प्रताप आज भी करोड़ों भारतवासियों के हृदय पर राज करते है और दूसरी ओर अकबर के वंशज आज होटलों में जूठे बर्तन साफ कर अपनी आजीविका चला रहे है। श्री साँवला टिमरनी में आयोजित श्रद्धेय भाऊ साहेब भुस्कुटे स्मृति व्याख्यानमाला के 28वें वार्षिक आयोजित में हल्दीघाटी का सच विषय पर अपना व्याख्यान दे हे थें। श्री साॅंवला ने आगे कहा कि इतिहास घास के तिनकों से नहीं तीरों से बनता है, भूगोल से नहीं वीरों से बनता है। महाराणा प्रताप के जीवन का संघर्ष केवल हिन्दू मुसलमान के बीच का नहीं था बल्कि जीवन मूल्यों की रक्षा के लिए था, धर्म के लिए था स्वदेषी के लिए था। उन्होने जीवन मूल्यों की स्थापना का कार्य किया।
जीवन मूल्यों की स्थापना के लिए जन जागरनण जन सगठन और जन समर्पण की आवशकता होती है। महाराणा प्रताप ने यही किया। भगवान राम कृष्ण, शिवाजी और गुरू गोविन्दसिंह जी ने भी यही किया। आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, गायत्री परिवार और आर्य समाज जैसे संगठन जीवन मूल्यों के लिए संगठन जागरण और समर्पण का कार्य कर रहे है।विषय को आगे बढाते हुए श्री साॅंवला ने कहा कि अकबर के दूत राजा मानसिंह ने महाराणा प्रताप से अकबर की आधीनता स्वीकार करने का प्रस्तान किया जिसे अकबर ने हुकरा दिया। अपमान से घायल मानसिंह को अकबर ने महाराणा प्रताप पर चढ़ाई कने का आदेष दिया। सांप काटने के बाद पलटता है और दोगला व्यक्ति पलटने के बाद काटता है। एक लाख पैंसठ हजार की सेवना ने महाराणा प्रताप से युद्ध करने के लिए तीन ओर कुच किया। महाराणा प्रताप की ओर से भी कई हिन्दू राजा और वीर आए। 36 प्रकार की जातियाॅं युद्ध में लड़ने के लिए आए। यह महाराणा प्रताप की सामाजिक समरसता थी। मेरे देष में जाति प्रथा नहीं थी जाति प्रथा और घूॅंघट मुगलों ने कारण भारत में आए। 18 जून 1576 के पहले हल्दीघाटी युद्ध की व्यूह रचना की गई। युद्ध शुरू हुआ। कौन किस पक्ष में है इसका पता नही चलता था क्योंकि कोई ड्रेस कोड़ नही था। अकबर के सेनापति ने कहा कि युद्ध शुरू किया जाय। दोनो तरफ मरेंगे तो काफिर ही मरेंगे। हल्दीघाटी के रक्त की नदियाॅं बहने लगी। चेतक पर महाराणा प्रताप सवार होकर आगे बढ़े और मानसिंह के हाथी के मस्तक पर चेतक ने अपने दोनों पैर रख दिए। चेतक की दोनों पिछली टांगे कट गई थीं फिर भी 18 फीट चोड़े नाले को पार कर गया। मरते समय चेतक की गर्दन महाराणा प्रताप की गोद में थी। आॅंखों से आंसू वह रहे थे। युद्ध का बेहद रोमांचकारी वर्णन श्री हुकुमचंद साॅंवला ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में किया जिसे श्रोताओं ने मंत्रमुग्ध होकर सुना।श्री साॅंवला ने आगे कहा कि इतिहास के छायामार शैल के युद्ध की शुरूवात महाराणा प्रताप ने हल्दी घाटी के युद्ध के समय की थी। 18 जून से शुरू हुआ यह युद्ध सितम्बर तक चला था। युद्ध के वर्णन समूचे पांडाल में बार बार तालिया की गड़गडाटर गुॅंजती रही।उन्होंने वहां कि इतिहासकार हल्दीघाटी के युद्ध को अनिर्णीत बताते है या इसमें महाराणा प्रताप की हार हुई लेकिन एक लाख पैसठ हजार की अकबर की सेना में से युद्ध के बाद केवल चैदह सौ सैनिक ही वापस लौटे थे। सच तो पहले कि हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की विजय हुई थी। श्री साॅंवला ने कहा कि षिवाजी और महाराणा प्रताप के वंषजों को भारत रत्न मिलना चाहिए और देष की आने वाली पीढ़ी को सच्चा इतिहास पढ़ाया जाए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता समाजसेवी श्री शिवनारायण निकुम ने की। प्रारम्भ में अतिथियों के श्रद्धेय भाऊ साहेब भुस्कुटेजी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित किया। सृष्टि कुशवाहा, स्निग्धा भुस्कुटे और पूजा पारे ने श्री राम की स्तुति प्रस्तुत की। अतिथियों का स्वागत श्री राजा भुस्कुटे और श्री विनायक गद्रे ने किया। कार्यक्रम का संचालन श्री विवेक शर्मा ने किया। रमेश दीक्षित ने व्याख्यानमाला से जुडे़ वयोवृद्ध सदस्य स्व श्री काशीनाथ अमलाथे का स्मरण किया और उन्हे श्रद्धांजलि दी। काशीनाथ जी का हाल ही में निधन हुआ है। कार्यक्रम का आभार श्री विनोद बोरसे ने माना। वन्दे मातरम् के गायन के साथ पहले दिन का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।