चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को शीतला सप्तमी कहते हैं। इस दिन शीतला माता को प्रसन्न करने के लिए पूजा व व्रत किया जाता है। बुधवार शीतला सप्तमी के अवसर पर नगर श्री शीतला माता मंदिर पर माता शीलता की सप्तमी का पूजन करने के लिए सुबह से ही भक्तों का तांता लग रहा । जिसके चलते माता मंदिर के पट सुबह 4 बजे से ही खोल गए। इस अवसर पर शीतला माता की प्रतिमा का आकर्षक रूप से भव्य श्रृंगार किया गया। मान्यता हे कि शीतला सप्तमी का व्रत करने से शीतला माता प्रसन्न होती हैं तथा जो यह व्रत करता है, उसके परिवार में दाहज्वर, पीतज्वर, दुर्गंधयुक्त फोड़े, नेत्र के समस्त रोग तथा ठंड के कारण होने वाले रोग नहीं होते। शीतला देवी के स्वरूप का शीतला स्तोत्र में इस प्रकार वर्णन किया गया है। शीतला सप्तमी की कथा इस प्रकार है किसी गांव में एक महिला रहती थी। वह शीतला माता की भक्त थी तथा शीतला माता का व्रत करती थी। उसके गांव में और कोई भी शीतला माता की पूजा नहीं करता था। एक दिन उस गांव में किसी कारण से आग लग गई। उस आग में गांव की सभी झोपडियां जल गई, लेकिन उस औरत की झोपड़ी सही-सलामत रही। सब लोगों ने उससे इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि मैं माता शीतला की पूजा करती हूं। इसलिए मेरा घर आग से सुरक्षित है। यह सुनकर गांव के अन्य लोग भी शीतला माता की पूजा करने लगे।इस व्रत की विशेषता है कि इसमें शीतला देवी को भोग लगाने वाले सभी पदार्थ एक दिन पूर्व ही बना लिए जाते हैं और दूसरे दिन इनका भोग शीतला माता को लगाया जाता है। इसीलिए इस व्रत को बसोरा भी कहते हैं। मान्यता के अनुसार इस दिन घरों में चूल्हा भी नहीं जलाया जाता यानी सभी को एक दिन बासी भोजन ही करना पड़ता है।
