टिमरनीः-
श्रद्धेय भाऊ साहब भुस्कुटे स्मृति व्याख्यानरमाला का 27वाँ वार्षिक आयोजन समारोह प्रारम्भ हुआ। कार्यक्रम में अतिथियों ने सबसे पहले श्रद्धेय भाऊ साहब भुस्कुटे जी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित किया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता आई.आई.टी. मुम्बई के प्रोफेसर डाॅ. चेतन सिंह सोलंकी ने कहां कि ऊर्जा पर हमारी निर्भरता बढ़ती जा रही है इसके दुष्परिणाम हमें शायद 100 साल के बाद भुगतान पडे़गा। एक तरफ सौ करोड़ लोग दुनिया में ऐसे हैं जिनके पास बिजली की सुविधा नहीं है। दूसरी और कुछ देष ऐसे है जो बिजली का बेजा इस्तेमाल कर रहे है। इससे पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है, ग्लेषियर पिघल रहे है। 1985 में ध्रुवीय क्षेत्र में 76 लाख वर्ग किलोमीटर बर्फ भी जो पिघलकर वर्तमान में 86 लाख वर्ग किलोमीटर रह गई है। यह भयावह स्थिति है।
यदि जैसा चल रहा है वैसा ही चालने दिया जाए तो पृथ्वीं का वातावरण इस सदी के अंत तक 4 से 5 डिग्री तक बढ़ जाएगा जिससे समुद्र में पानी ररकी सतह 70 से 80 सेंटीमीटर बढ़ जाएगा। अनेक देषों का अस्तित्व की समाप्त हो जाएगा। कुछ हजार वर्षो में मनुष्य का अस्तित्व डायनोसोर की तरह लुप्त हो जाएगा।
उन्होंने कहा कि विकास के लिए ऊर्जा का उपयोग जरूरी है लेकिन ऊर्जा का उपयोग पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है। ऐसे में महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज की कल्पना से हम इससे बच सकते है। आत्म निर्भर ग्राम में ऊर्जा स्वराज लाकर समस्या का हल संभव है। एक यूनिट बिजली पैदा करने के लिए लगभग 800 ग्राम कार्बनडाई आॅक्साइड का उत्सर्जन होता है। हमें इसका अनुभव नहीं होता क्योंकि पर्यावरण के प्रति हमारी अंदर चेतना नही है।इस दौरान सैकड़ो की सख्या में श्रोता उपस्थित रहे।
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श्रद्धेय भाऊ साहब भुस्कुटे स्मृति व्याख्यानरमाला का 27वाँ वार्षिक आयोजन समारोह प्रारम्भ हुआ। कार्यक्रम में अतिथियों ने सबसे पहले श्रद्धेय भाऊ साहब भुस्कुटे जी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित किया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता आई.आई.टी. मुम्बई के प्रोफेसर डाॅ. चेतन सिंह सोलंकी ने कहां कि ऊर्जा पर हमारी निर्भरता बढ़ती जा रही है इसके दुष्परिणाम हमें शायद 100 साल के बाद भुगतान पडे़गा। एक तरफ सौ करोड़ लोग दुनिया में ऐसे हैं जिनके पास बिजली की सुविधा नहीं है। दूसरी और कुछ देष ऐसे है जो बिजली का बेजा इस्तेमाल कर रहे है। इससे पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है, ग्लेषियर पिघल रहे है। 1985 में ध्रुवीय क्षेत्र में 76 लाख वर्ग किलोमीटर बर्फ भी जो पिघलकर वर्तमान में 86 लाख वर्ग किलोमीटर रह गई है। यह भयावह स्थिति है।
यदि जैसा चल रहा है वैसा ही चालने दिया जाए तो पृथ्वीं का वातावरण इस सदी के अंत तक 4 से 5 डिग्री तक बढ़ जाएगा जिससे समुद्र में पानी ररकी सतह 70 से 80 सेंटीमीटर बढ़ जाएगा। अनेक देषों का अस्तित्व की समाप्त हो जाएगा। कुछ हजार वर्षो में मनुष्य का अस्तित्व डायनोसोर की तरह लुप्त हो जाएगा।
उन्होंने कहा कि विकास के लिए ऊर्जा का उपयोग जरूरी है लेकिन ऊर्जा का उपयोग पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है। ऐसे में महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज की कल्पना से हम इससे बच सकते है। आत्म निर्भर ग्राम में ऊर्जा स्वराज लाकर समस्या का हल संभव है। एक यूनिट बिजली पैदा करने के लिए लगभग 800 ग्राम कार्बनडाई आॅक्साइड का उत्सर्जन होता है। हमें इसका अनुभव नहीं होता क्योंकि पर्यावरण के प्रति हमारी अंदर चेतना नही है।इस दौरान सैकड़ो की सख्या में श्रोता उपस्थित रहे।
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