व्याख्यानमाला समिति द्वारा श्रद्धेय भाऊ साहेब भुस्कुटे स्मृति व्याख्यान माला कार्यक्रम का आयोजन सरस्वती शिशु मंदिर प्रांगण में किया गया। द्वितीय दिवस कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. राम दोगने ने की, वक्ता रामदत्त चक्रधर सह सरकार्यवाह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रहे। मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह रामदत्त चक्रधर ने स्वाधीनता आंदोलन में जनजातीय समाज की भूमिका विषय पर अपने व्याख्यान में कहा कि वर्तमान समय वैचारिक संघर्ष का समय है,किसी शस्त्र के द्वारा मारा जाये तो वह पूरी तहर समाप्त नही होगा। लेकिन किसी विचार को समाप्त कर दिया जाये उन्होने प्रज्ञा हताश का प्रयोग किया, तो वो ही नही उसकी परम्परा जीवन मूल्य सब कुछ समाप्त हो जाया करता है। इस देश में जितने भी आक्रान्ता आये ढच, यवन, यहूदी, तुर्क, मुगल आये उन्होने शस्त्रों का उपयोग किया लेकिन इस देश में जो अंग्रेज जाति आये उन्होने इस देष अंदर केवल प्रज्ञा हताश का प्रयोग किया इस देश की प्रज्ञा को समाप्त करने का कार्य किया। जेम्स बिल नामक एक इतिहासकार इतिहास लिखते है वेस्ट हिस्ट्री आफॅ इण्डिया उसको कहा जाता है उसकी प्रस्तावना में लिखते है कि मै कभी भारत गया नही मै कोई भारतीय भाषा जानता नही मै कोई भारतीय सेे मिला नही ऐसा व्यक्ति भारत का इतिहास लिखता है। जेम्स बिल और हम उसे पढ़कर डिग्री लेते है। वो क्या इतिहास होगा ऐसा अन्य-अन्य साधनों से उस अंग्रेज जाति ने देश की प्रज्ञा को समाप्त करने का प्रयास किया गया। ऐसे काल्यखण्ड में जब इस देष की सारी प्रज्ञा ही छुप्त हुई। ऐसे समय में देष क्रांतिकारियों, लेखकों और कवियों ने देष की प्रज्ञा को जगाने का कार्य किया। आज हम सब वैचारिक अनुष्ठान में लगे है। यह व्याख्यानमाला उसी का एक हिस्सा है। यह भी एक प्रकार से प्रज्ञा को जागृत करने का प्रयास है। भाऊ साहब भुस्कुटे एक गृहस्थ संयासी थे। सन्यासी कौन कहा जाता है जो न किसी से द्वेष न कोई अभिलाषा रखता हैं। पद प्रतिष्ठा और सम्मान से परे रहते है। ऐसे समय मे ंहम सब लोगो का यह दायित्व है कि उन सब महापुरूषों का जिन्होने स्वाधीनता आन्दोलन में अपना योगदान दिया। देश का ऐसा कोई प्रान्त नही था। जहां से छोटे बालक से लेकर बूढे व्यक्ति ने अपना योगदान नही हो इस आन्दोलन में किसान मजदूर श्रमिक सभी ने अपना योगदान दिया। स्वधीनता आन्दोलन में जनजाति समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही। जिनके अन्दर जल जंगल जमीन के लिए आत्मीयता का भाव है। ऐसे जनजाति के योगदान को सफलता पूर्वक इतिहास में स्थान मिलना चाहिए था। ऐसे जनजाति समाज के योगदान को समाज के सामने लाने एवं पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए। जलियाबाग का उदाहरण देते हुऐ कहा कि हजारो की संख्या में लोग एकत्रित थे जिन पर जर्नल डायर ने गोलीयों के षिकार हुऐ अंग्रेज सरकार एकी कर लगाया जिसका भुगतान समाज के हर वर्ग को करना अनिवार्य था। यह कर नही देना चाहिए इस हेतु मोतीलाल तेजरिया द्वारा जनजाति समाज एकत्रित कर इसका विरोद्ध किया। हजार फांसी वाला बरगद का पेड जलियावाला बाग से कम नही था। महाराष्ट्र में रावलापानी गांव में गुला महाराज द्वारा जनजाति समाज का सम्मान नही मिल पा रहा है। इसलिए इन्होने ने आपकी जय हो नारा दिया। उन्होने ने सन 1935 में एक सामूहिक आरती का कार्यक्रम चालू किया। सन 1938 में सामूहिक आरती में बढ़ी संख्या में लोग शामिल हुए। विरसा मुण्डा पढने छात्रावास में गौमांस दिया जाता हैं। विरसा मुण्डा द्वारा इसका विरोद्ध किया गया। गांव गांव से लोग भगवान विरसा गुणगान करते हुऐ हजारों की संख्या में लोग एकत्रित हुए। परिणाम स्वरूप अंग्रेजों अफसरों ने इन पर गोली की वर्षा की गई पूरी पहाडी खून से रंजीत की हुई। आपने इस आंदोलन में पुरूषा के साथ महिलाओं का बराबरी का योगदान है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. राहुल अग्रवाल ने किया एवं आभार डॉ. अतुल गोविन्द भुस्कुटे ने सभी के प्रति आभार माना। तथा विद्यालय के भैया-बहिनों द्वारा वंदे मातरम् प्रस्तुत किया गया।