हम बहुत ही भाग्यशाली है कि इस भारत भूमि में हमें जन्म लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ-श्री अंबेकर

त्रिमूर्ति न्यूज दीपक यादव
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हम बहुत ही भाग्यशाली है कि इस भारत भूमि में हमें जन्म लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ-श्री अंबेकर
दो दिवसीय श्रध्देय भाऊ साहेब भुस्कुटे स्मृति व्याख्यानमाला का हुआ समापन


 टिमरनी- 

श्रध्देय भाऊ साहेब भुस्कुटे स्मृति व्याख्यानमाला का आयोजन व्याख्यानमाला समिति द्वारा  स्थानीय सरस्वती शिशु मंदिर टिमरनी में किया गया। नगर में तीन दशक से व्याख्यानमाला समिति द्वारा व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया 9 जनवरी एवं 10 जनवरी को दो दिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। व्याख्यानमाला के प्रथम दिन मुख्य वक्ता विजय मनोहर तिवारी राज्य सूचना आयुक्त ,न्यासी- भारत भवन एवं लेखक द्वारा भारत के मध्यकालीन इतिहास की अनकही कहानी विषय पर वक्तव्य दिया। अपने  उद्बोधन में  श्री तिवारी ने भारत में मध्यकालीन इतिहास में दमनकारी युग के प्रारंभ होने से लेकर उसके अंत तक के अदभुत, अकल्पनीय एवं अविस्मरणीय अनछुए पहलुओं को रखा। मुगलों की दमनकारी नीतियों हिंदू धर्म एवं सनातन संस्कृति की अक्षुणता को नष्ट एवं भ्रष्ट करने के लिए अपनाए गए दुष्प्रयासो, भारतवर्ष में उनके द्वारा दिल्ली को अपना अड्डा बना  कैसे  लूट पाट की और भारत की धन संपदा को कैसे लूटा व कैसे लोगों को अपने बाहुबल ,तलवार के दम पर इस्लाम में मतांतरण किया और कैसे  जिन लोगों ने अपना मत छोड़ने से इंकार करने पर उनकी हत्या की गई और मंदिरों में लूटपाट मचाकर उन्हें कैसे तोड़ा गया।
                       द्वितीय दिवस सोमवार मुख्य वक्ता सुनील अंबेकर अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख ,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्वतंत्रता की ओर विषय पर व्याख्यान दिया। श्री अंबेकर ने कहा कि हम बहुत ही भाग्यशाली है कि इस भारत भूमि में हमें जन्म लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, जिस वसुंधरा ने इस भूमि मैं अनगिनत वीरो, वीरांगनाओं, वीर पुत्रों को जन्म दिया है आज हमारा अस्तित्व ही उन्हीं से है दुनिया में अनेक देश आज ऐसे हैं जिनकी संस्कृति या उनकी पहचान आज समाप्त हो गई है।किंतु भारत ही है जिसने अपना संघर्ष जारी रखा और आज भी संघर्ष जारी है हमारे देश में भाषा अलग अलग दिखती है पहचान अलग अलग दिखाई देता है किंतु विषम से विषम परिस्थिति में इसकी एकता देखने को मिलती है 1857 की क्रांति में अंग्रेजों की दमनकारी नीति हमें दिखाई दी किंतु वीर सावरकर देते देशभक्त में ब्रिटिश साम्राज्य को केंद्र लंदन में जाकर उन्हें चुनौती दी।रानी चेन्नम्मा, रानी दुर्गावती ,झांसी की रानी अनेक वीरांगनाओं ने स्वाधीनता के लिए आवाज उठाई ओर लड़ाई लड़ी। स्वाधीनता का आंदोलन हमारे चरित्र को बताता है कि पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाओं भी इस आंदोलन में कूद पड़ी थी। स्वाधीनता का आंदोलन केवल राजनीतिक स्वतंत्रत का आंदोलन नहीं था देश में सर्वधर्म की रक्षा का आंदोलन था इस आंदोलन में सभी की सहभागिता रही, भगवान बिरसा मुंडा से लेकर सुभाष चंद्र बोस व अनगिनत लोगों ने अपना योगदान इस आंदोलन में दिया और अपने प्राणों की आहुति दी तब जाके हमें स्वाधीनता मिली है आज उनको स्मरण करने का दिन है।आज देश के प्रत्येक नागरिक को सोचना हुआ कि हम स्वाधीन भी रहे और स्वतंत्र भी रहे अपने व्यवहार से समाज में दुनिया में एक उदाहरण प्रस्तुत करें दुनिया में एक आदर्श प्रस्तुत करें कि हम भी सुखी हो और लोग भी सुखी हों, इस प्रकार सोचे विचार करें एवं संकल्प लें। इस कार्य करने की ईश्वर शक्ति दे इस हेतु स्थान कोई सा भी हो सकता है,टिमरनी भी हो सकता है,इसका बिगुल कही से भी बजाया जा सकता है।कार्यकम की अध्यक्षता प्रथम दिसव प्रहलाद सिह पटेल रुन्दलाय , द्वितीय सरकार मोहनदास महंत पोखरनी ने की व आभार डॉ अतुल  भुस्कुटे द्वारा व्यक्त किया गया।

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