शिक्षा नीति का संकल्प है कि भारत को वैश्विक ज्ञान की महाशक्ति बनाया -डॉक्टर गोविंद प्रसाद शर्मा
टिमरनी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम गृहस्थ प्रचारक श्रद्धेय भाऊ साहब भुस्कुटे स्मृति व्याख्यानमाला के 29 वें वर्ष के द्वितीय पुष्प को सुधी श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत किया गया । इस ज्ञानयज्ञ के द्वितीय दिवस में डॉक्टर गोविंद प्रसाद शर्मा जो उच्च शिक्षा विभाग में अतिरिक्त संचालक पद से सेवानिवृत्त हुए एवं विद्या भारती के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे उनके नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति दिशा और दृष्टि विषय पर अपना व्याख्यान दिया l उन्होंने अपने व्याख्यान में कहा कि 1835 में लार्ड मैकाले ने अपने भाषण में कहा था कि भारत के लोग रूप रंग से भले ही भारतीय हो लेकिन अपनी सोच, मूल्यों, अभिरुचि , अपनी दृष्टि, अपना विजन इन सभी से वह अंग्रेज ही होंगे । इस शिक्षा नीति का संस्कारों से कोई मतलब नहीं था इसीलिए आजादी के बाद भी इस शिक्षा नीति ने हमारे उद्देश्यों को पूरा नहीं किया । आजादी के आंदोलन में स्वास्थ एवं शिक्षा एक बड़ा मुद्दा था l तिलक जी ने उस समय 3 शब्द दिए थे स्वदेशी, स्वराज्य, स्वशिक्षाl
स्वतंत्रता के लिए संघर्ष
स्वशिक्षा के लिए भी थाl भारतीय मूल्य, विचार, सोच, चिंतन ,यह सब उस शिक्षा से निकल नहीं रहा था। इसीलिए गांधीजी, तिलक जी, महर्षि अरविंद, टैगोर जैसे अनेक महापुरुषों ने शिक्षा का विकल्प खोजने या उसे बदलने के अनेक प्रयत्न किए इसी के चलते आर्य समाज ने अनेक विद्यालय स्थापित किए। आजादी के बाद भी अनेक शक्तियां हावी रही उन्होंने औपनिवेशिक लक्ष्यों को पुष्ट किया इसके तीन आधार हैं आजादी के बाद देश भले ही राजनीतिक तरीके से आजाद हुआ लेकिन वैचारिक दृष्टि से यूरोपीय आभामंडल इसके इर्द-गिर्द रहे उसके प्रयत्न किए गए। प्रशासनिक ढांचा, शिक्षा का ढांचा एवं न्यायिक ढांचा तीनों मिलकर के भारतीय चित्र को यूरोपीय मूल्यों के आसपास ही रखे रहे। और इसको पुष्ट करने का काम प्रशासनिक वर्ग ने किया।
प्रशासकों के दिमाग में पाश्चात्य छाया केंद्रित ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शिक्षण की चीजें जमी हुई थी वामपंथी विचारधारा ने शिक्षा का बहुत अहित किया उन्होंने पूर्वाग्रह से ग्रसित शोध किए। भारतीय चिंतन, इतिहास को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया। सच को सामने आने नहीं दियाl जबकि 2020 की शिक्षा पद्धति पाश्चात्य सोच व मार्क्सवादी चिंतन के घेरे से बाहर निकालती है। इसके चार लक्ष्य है पहला 2030 तक सभी को समावेशी व गुणवत्ता युक्त शिक्षा दी जाए। दूसरा इसके केंद्र में छात्र हो अर्थात छात्रों में जिज्ञासा, सोच प्रवृत्ति, संवाद शैली जागृत करना। तीसरा 2040 तक भारत शिक्षा के क्षेत्र में दुनिया के समुन्नत देशों से पीछे ना रहे। चौथा व अंतिम लक्ष्य शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति में निहित रचनात्मक क्षमताओं के विकास पर जोर देती है ।उन्होंने आगे कहा यह शिक्षा नीति छात्र को विषय या संकाय के घेरे में नहीं बांधती यह तो नैतिक और मानवीय मूल्यों को स्वीकार ती है। शोध कार्य, नवाचार को आगे बढ़ाना इसका आधार है ।लार्ड मैकाले का विजन अंग्रेजियत था परंतु नई शिक्षा नीति भारतीय मूल्य जैसे एकात्म मानववाद ,वसुधैव कुटुंबकम को केंद्र में रखती है इस शिक्षा नीति का संकल्प है भारत को वैश्विक ज्ञान की महाशक्ति बनाना क्योंकि जिसे ज्ञान नहीं है वह विश्व का नेतृत्व नहीं कर सकता ।भारतीय होने का गर्व केवल विचारों में नहीं अपितु व्यवहार में होना चाहिए।
यह ज्ञान नवीन अनुसंधान से अर्जित होता है भारत में अनुसंधान की जो स्थिति है वह चिंताजनक है भारत में जीडीपी का 0.69 प्रतिशत, खर्च होता है जबकि अमेरिका में 2.8% इजरायल में 4.3 प्रतिशत दक्षिण कोरिया में 4.2% तथा चीन में 2.1% खर्च होता है भारत में एक लाख लोगों पर केवल 15 लोग शोध कार्य में लगे हैं जबकि चीन में 111 लोग अमेरिका में 423 लोग इजराइल में 825 लोग लगे हैं नई शिक्षा नीति शोध कार्य को प्रोत्साहित करती है अटल टिंकरिंग लैब के कारण केवल विद्या भारती के ही विद्यालयों के तीन आवेदन पेटेंट के लिए आए हुए हैं। आज के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विद्या भारती के क्षेत्रीय संगठन मंत्री श्री निरंजन जी शर्मा रहे तथा अध्यक्षता हरदा जिले के जिला शिक्षा अधिकारी श्री डीएस रघुवंशी द्वारा की गई। संचालन श्री विनोद बोरसे ने किया आभार श्री दीपक चंदेवा ने व्यक्त किया।