टिमरनी-
श्रद्धेय भाऊ साहब भुस्कुटे स्मृति व्याख्यान माला के तीसरे और अंतिम दिन प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक श्री जे. नन्दकुमार का ‘भारत की ज्ञान परंपरा’ विषय पर प्रेरक व्याख्यान हुआ। विषय का प्रतिपादन करते हुए उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति में ज्ञान को सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। हमारे देश का नाम भारत भी इस देश की परम्परा में ज्ञान में आनन्द का अनुभव करने वाले देश के कारण ही पड़ा है। उन्होंने आगे कहा कि केवल सफल जीवन ही पर्याप्त नहीं है सार्थक जीवन ही सफल जीवन है। धर्म एक ऐसा शब्द है जिसका अनुवाद नहीं किया जा सकता। धर्म का अर्थ केवल धर्म शब्द से ही प्रकट हो सकता है। मत या रिसीजन शब्द धर्म का सही अनुवाद नहीं है। दर्शन शब्द का अनुवाद फिलासफी भी सही अर्थ प्रकट नही करता है। ज्ञान भी एक ऐसा ही शब्द है। विद्या एक और शब्द है। जिसका सही सही अनुवाद नहीं किया जा सकता है। भारत में परा और अपरा के रूप में विद्या का समान रूप से विकास हुआ। हमारे वेद अपरा विद्या की श्रेणी में आते हैं। विश्व का सबसे विकसित व्याकरण संस्कृत भाषा का है। श्री जे. नन्दकुमार ने आगे कहा कि सूक्ष्म समय लेकर स्थूल समय तक की गणना भारतीय महर्षियो ने की है। पूजा के लिए प्रतिदिन किए जाने वाले संकल्प में काल गणना का विवेचन किया गया है। यह हमारे देश के विकसित विज्ञान उदाहरण है। यहाँ 64 कलाएँ विकसित हुई जो भारत के प्राचीन विष्वविद्यालयों में सिखाई जाती थी। भारत की विद्याओं की रचना कंठस्थ करने लायक सूत्र रूप में या काव्य रूप में की गई ताकि आसानी से याद हो सके। इस प्रकार की श्रेष्ठ ज्ञान परम्परा को नष्ट नहीं किया भंडारण किया जाता है।प्रशचिम के लोग ज्ञान का उपयोग संघर्ष के लिए करते है। वहां शंका के समाधान के लिए प्रशन नहीं किया जा सकता है। प्रशन पूछने पर तर्क में जाना पड़ता है। प्रश्चिम की धारणा में प्रकृति को मनुष्य के लिए बनाया गया है। इस लिए उनका शोषण किया जाता है जबकि हमारे यहाँ प्रकृति के दोहन की व्यवस्था है अर्थात प्रकृति से उतना ही लेना जितनी हमें आवष्यकता है साथ ही प्रकृति के शोषण के लिए उनकी पूजा करने का भी विधान है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता टिमरनी के समाजसेवी अजित कुमार जैन ने की तथा संस्कृत में संचालन विक्रम भुस्कुटे ने किया। कार्यक्रम का प्रारम्भ श्रद्धेय भाऊ साहब भुस्कुटे के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। श्री पद्म सिंह राजपूत ने अतिथियों का पुष्पहार से स्वागत किया। श्री भास्कर ने ने गीत प्रस्तुत किया। डाॅ. अतुल गोविन्द भुस्कुटे ने अतिथियों व श्रोताओं के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की। वन्दे मातरम् के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। आज भी श्रोतागण बड़ी संख्या में उपस्थित थे। वैदिक विद्या पीठम् चिचोट के बटुओं ने कार्यक्रम के स्तोत्र गान किया। कार्यक्रम में समाज सेवा के अभिनव कार्य के लिए तिमिर हरणी संस्था व श्री मदन पंजाबी का सम्मान किया गया।