प्राणी मात्र के बारे में जो सोचे वही सर्वश्रेष्ठ आत्मा:- मुनिश्री वीर सागर

त्रिमूर्ति न्यूज दीपक यादव
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प्राणी मात्र के बारे में जो सोचे वही सर्वश्रेष्ठ आत्मा: मुनिश्री वीर सागर
विहार करते टिमरनी पधारे 80 लाख का पैकेज छोड़ बने संत- विदेशों से भी मिले नौकरी के ऑफर

 टिमरनी। 

कोई व्यक्ति केवल अपने बच्चों के बारे में सोचता है। कोई परिवार के बारे में, कोई समाज, नगर, प्रदेश, राष्ट्र के बारे में और कोई इससे भी आगे विश्व के बारे में सोचता है। किंतु जो प्राणी मात्र की भलाई के बारे में सोचता है, वही महान है। वही सर्वश्रेष्ठ आत्मा है। 
यह उदगार मुनिश्री वीरसागर जी महाराज ने व्यक्त किए। तारण भवन में बुधवार को आयोजित धर्मसभा में उन्होंने ना केवल अपने अनुयायियों को उपदेश करने के लिए ही यह उदगार व्यक्त  किए,बल्कि उसे अपने असल जीवन में भी अमल किया है। घर में सबसे बड़े और उच्च शिक्षित  बी. टेक. ( केमिकल इंजी. ) , एमबीए ( फाइनेस) , सी. एफ. ए. ( तीसरा लेवल) एवं पी.जी.सी.ए. की डिग्री के साथ विदेशों से नौकरी के ऑफर (80 लाख का पैकेज) छोड़ संत जीवन स्वीकार किया। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के शिष्य , सीधे मुनिश्री की दीक्षा लेने वाले श्री वीरसागर जी महाराज ने कहा, अपने लिए तो पशु पक्षी भी जीते हैं। वे भी अपना वंश बढ़ाते है। मनुष्य भी वही कर रहा है। फिर मनुष्य श्रेष्ठ कैसे? उन्होंने धर्म सभा में उपस्थित मातृशक्ति का से कहा, माता सिर्फ बच्चे के शरीर को जन्म देती है। उसे मनुष्य बनाने का काम संस्कार देकर पूरा होता है। शरीर को संस्कार देने का काम गुरु करते हैं। बिना संस्कारों वाला मनुष्य शरीर किसी काम का नहीं। मुनिश्री  ने राम और दुर्योधन के चरित्र प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा, राम ने अपने पिता के वचन के कारण राज पाट एक क्षण में छोड़ कर पिता का सम्मान किया। वहीं दुर्योधन ने राज पाने के लिए भाइयों में महाभारत जैसा युद्ध करवा दिया। दोनों में फर्क सिर्फ संस्कारों का है। अपने घर में अगर संतान माता पिता का सम्मान करे। घर में शांति रहे, तो संतान को संस्कार का पाठ पढ़ाएं और गुरु के पास भेजें। 
 महाराज श्री का मंगल विहार टिमरनी नगर में हुआ, इस मौके पर नगर के तारण भवन में नगर परिषद अध्यक्ष  देवेंद्र भारद्वाज  ने मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज के दिव्य दर्शन कर क्षेत्र की सुख, समृद्धि और खुशहाली का आशीर्वाद मांगा।



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